महालवाड़ी व्यवस्था कब और किसने लागू की?

महालवाड़ी व्यवस्था के अन्तर्गत भूमिकर की इकाई कृषक का खेत नहीं बल्कि ग्राम समुदाय या महल (जागीर का एक भाग) होता था। भूमि पर समस्त ग्राम समुदाय का सम्मिलित रूप से अधिकार होता था।
ग्राम समुदाय के लोग सामूहिक या व्यक्तिगत रूप से लगान की अदायगी कर सकते थे। यदि को व्यक्ति अपनी जमीन को छोड़ देता था तो ग्राम समाज इस भूमि को सम्भाल लेता था। ग्राम समाज को ही सम्मिलित भूमि का स्वामी माना जाता था।
लगान को एकत्रित करने का कार्य पूरे ग्राम या महाल समूह का होता था। महाल के अन्तर्गत छोटे एवं बड़े सभी प्रकार के जमींदार आते थे।
महालवाड़ी व्यवस्था का प्रस्ताव सर्वप्रथम 1819 ई. में “हाल्ट मैकेंजी” ने दिया था। इस व्यवस्था के सम्बन्ध में हाल्ट मैकेंजी ने यह सुझाव दिया कि भूमि का सर्वेक्षण किया जाये, भूमि से सम्बन्धित व्यक्तियों के अधिकारों का व्यरा रखा जाये, लगान के निर्धारण हेतु गांव समूह (महाल) को इकाई के रूप में रखा जाये।
मैकेंजी के सुझावों को 1822 ई. में रेग्यूलेशन-7 के माध्यम से कानूनी रूप दिया गया। इस रेग्यूलेशन के तहत लगान भू-उपज का 80% निश्चित किया गया। लगान की मात्रा अधिक होने के कारण किसानों को समस्या उत्पन्न हुई। तब 1833 ई. में विलियम बैंटिक इसमें संशोधन करके रेग्यूलेशन-9 पारित किया। जिसे मार्टिन बर्ड तथा जेम्स टाम्सन ने क्रियान्वित किया।
इस रेग्यूलेशन में भूमिकर 66% निर्धारित किया गया। क्योंकि यह योजना “मार्टिन बर्ड” की देख रेख में लागू की गयी थी इसलिए उन्हें उत्तरी भारत में ” भू-राजस्व व्यवस्था का जनक” कहा जाता है।
महालवाड़ी व्यवस्था उत्तर प्रदेश, पंजाब मध्य प्रान्त तथा दक्षिण भारत के कुछ जिलों में लागू की गयी। इस व्यवस्था को ब्रिटिश भारत की 30% भूमि पर लागू किया गया।
66% भूमिकर को दे पाना भी किसानों के लिए कठिन हो रहा था। अतः लार्ड डलहौजी ने इसका पुनरीक्षण कर 1855 ई. में “सहारनपुर नियम” के अनुसार लगान की राशि 50% निर्धारित कर दी। इस व्यवस्था का परिणाम भी किसानों के प्रतिकूल रहा। जिसके कारण 1857 ई. के विद्रोह में इस व्यवस्था से प्रभावित लोगों ने हिस्सा लिया।