11 मौलिक कर्तव्य कौन कौन से हैं

11 मौलिक कर्तव्य कौन कौन से हैं – मूल अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का घनिष्ठ संबंध है। जहाँ अधिकार होंगे, वहाँ कर्तव्यों का होना भी अनिवार्य माना जाता है। साम्यवादी देशों के संविधानों में अधिकारों की अपेक्षा नागरिकों के मूल कर्तव्यों पर विशेष बल दिया गया है, जैसा कि गांधीजी का कहना है “अधिकार का स्रोत कर्तव्य है। यदि हम सब अपने कर्तव्यों का पालन करें तो अधिकारों को खोजने हमें दूर नहीं जाना पड़ेगा। यदि अपने कर्तव्यों को पूरा किए बिना हम अधिकारों के पीछे भागेंगे तो वे छलावे की तरह हमसे दूर रहेंगे, जितना हम उनका पीछा करेंगे वह उतनी ही दूर उड़ते जाएँगे। …जीवित रहने का अधिकार भी हमें तभी प्राप्त होता है जब हम विश्व की नागरिकता के कर्तव्य को पूरा करते हैं।”

विश्व के प्रमुख लोकतांत्रिक देशों के संविधानों में मूल कर्तव्यों का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है। भारत के अंगीकृत संविधान में भी नागरिकों के मूल अधिकारों का उल्लेख तो किया गया था, किंतु उनके कर्तव्यों का निर्धारण नहीं किया गया। हालाँकि भारतीय परंपराओं एवं चिंतनधाराओं ने सदियों से कर्तव्यों पर बहुत बल दिया

मूल कर्तव्यों के क्रियान्वयन के लिए भारत सरकार द्वारा गठित वर्मा समिति (1999) ने भी इस ओर संकेत किया है, “अनुच्छेद-51(क) का गहन मूल्यांकन यह प्रदर्शित करता है कि ये धाराएँ ऐसे मूल्यों की अभिव्यक्ति हैं, जो भारतीय परंपरा, मिथकों, धर्मों तथा व्यवहारों में विद्यमान रही हैं। आज इतिहास के इस मोड़ पर राष्ट्र अति आवश्यक रूप से इनको पुनः इस प्रकार महत्त्व प्रदान करने की आवश्यकता अनुभव कर रहा है कि सारी पीढ़ियाँ इसे स्वीकार तथा आत्मसात् कर सकें। इस उद्देश्य को प्राप्त करने हेतु, यह आवश्यक होगा कि व्यक्ति में इस अवधारणा को स्वीकार तथा आत्मसात् करने की जागरूकता उत्पन्न करें, जिसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण हो और जो तनावों और विक्षोभ से मुक्त हो।”

भारतीय संविधान के 11 मौलिक कर्तव्य कौन कौन से है.
 11 मौलिक कर्तव्य कौन कौन से हैं

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11 मौलिक कर्तव्य कौन कौन से हैं

संविधान के भाग-4 (क) के अनुच्छेद-51 में उल्लिखित 11 मौलिक कर्तव्य इस प्रकार हैं

1. प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह संविधान का पालन करे व उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र-ध्वज और राष्ट्र गान का आदर करे।
2. स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे ।
3. भारत की प्रभुता, एकता और अखण्डता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे।
4. देश की रक्षा करे ।
5. भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे।
6. हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परम्परा का महत्व समझे और उसका परिरक्षण करे।
7. प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसका संवर्धन करे ।
8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञानार्जन की भावना का विकास करे।
9. सार्वजनिक सम्पत्ति को सुरक्षित रखे।
10. व्यक्तिगत एवं सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे।
11. माता-पिता या संरक्षक द्वारा 6 से 14 वर्ष के बच्चों हेतु प्राथमिक शिक्षा प्रदान करना (86वाँ संशोधन)

संविधान का पालन एवं आदर करना

भारतीय संविधान के अंतर्गत नागरिकों का पहला मूल कर्तव्य है कि वे निष्ठापूर्वक संविधान के अनुदेशों का पालन करें, क्योंकि यही देश का सर्वोच्च कानून है। इसके साथ ही संविधान के आदर्शों (लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद आदि), संस्थाओं (संसद्, कार्यपालिका, न्यायपालिका आदि) राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय गान का आदर करना भी इसी मूल कर्तव्य के अंतर्गत आता है।

ध्वज गौरव का प्रतीक होता है, इसीलिए उसका आदर करना राष्ट्र का आदर करना है। यह आदर ध्वजोत्तोलन के समय सावधान की अवस्था में प्रकट किया जाता है। इसी प्रकार राष्ट्रगान भी राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। राष्ट्रगान के समय भी नागरिकों को सावधान की अवस्था में खड़े होकर सम्मान प्रकट करना चाहिए। स्वतंत्रता के लिए प्रेरक उच्च आदर्शों का पालन स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए राष्ट्रीय आंदोलन की जो भूमिका रही है, उसकी प्रासंगिकता आज भी यथावत् विद्यमान है। यह राष्ट्रीय आंदोलन स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, धर्मनिरपेक्षता एवं साम्राज्यवाद का विरोध प्रभृति आदर्शों से प्रेरित रहा था। ये आदर्श आज भारतीय लोकतंत्र में भी प्रेरक हैं।

इसीलिए संविधान में व्यवस्था दी गई है कि प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करनेवाले उच्च आदर्शों को अपने हृदय में सँजोकर रखे और उन्हें प्रेरित करे।

भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा

भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। इतना ही नहीं, उसे अक्षुण्ण रखना भी उसका कर्तव्य है। यहाँ प्रभुसत्ता या प्रभुता से तात्पर्य है कि राज्य में कोई भी व्यक्ति, समुदाय या संस्था ऐसी नहीं है, जिसकी शक्ति राज्य के समकक्ष हो। नागरिक के लिए राज्य ही सर्वोपरि है। प्रत्येक नागरिक को राज्य के आदेशों का पालन करना है। यह आंतरिक प्रभुता के अंतर्गत आता है। बाह्य प्रभुता का अर्थ है कि राज्य किसी दूसरे राज्य से आदेश ग्रहण न करे।

वस्तुतः जब कोई राज्य भारत पर आक्रमण करता है, तो वह हमारी प्रभुता को चुनौती देता है। ऐसी दशा में प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह उस चुनौती को स्वीकार कर राज्य की रक्षा, एकता और अखंडता बनाए रखने में योगदान दे। देश की एकता को बनाए रखने के लिए नागरिकों को ऐसा व्यवहार करना चाहिए, जिससे उनमें संगठन प्रतीत हो।

देश की रक्षा करना

देश की रक्षा में ही नागरिकों की रक्षा निहित है। इसलिए देश की रक्षा करना और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करना प्रत्येक नागरिक का परम कर्तव्य है। राष्ट्रीय संकट की स्थिति में नागरिकों को व्यक्तिगत स्वार्थ और पारस्परिक भेदभाव भुलाकर राष्ट्र की रक्षा में लगे रहना चाहिए।

युद्धकाल में यदि देश को सैनिकों की आवश्यकता है, तो बिना किसी दबाव के स्वेच्छा से सेना में भर्ती होना चाहिए, वैसे राज्य भी संकटकाल में कानून बनाकर स्वस्थ नागरिकों से अनिवार्य सैनिक सेवा की माँग कर सकता है।

समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना विकसित करना

संविधान के अनुसार, प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की ऐसी भावना विकसित करे, जो धर्म, भाषा और देश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो। यही नहीं, ऐसी प्रथाओं का त्याग करना चाहिए, जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हैं, क्योंकि संविधान की दृष्टि में सभी नागरिक समान हैं। धर्म, भाषा, प्रदेश या वर्गभेद के आधार पर नागरिकों में किसी भी प्रकार की असमानता अपेक्षित नहीं है।

सामासिक संस्कृति का महत्त्व समझना

प्रत्येक देश का अपना एक समाज होता है और समाज की एक संस्कृति होती है। भारत भी इसका अपवाद नहीं है। भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक एकता, विश्व-बंधुत्व, अतिथि सत्कार, सर्वधर्म समभाव, शरणागत की रक्षा, त्याग, बलिदान आदि आदर्शों से परिपूर्ण रही है। __ भारतीय संस्कृति की इस गौरवशाली परंपरा के इन मूलभूत तत्त्वों का महत्त्व प्रत्येक नागरिक को समझना चाहिए। प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि इस परंपरा के महत्त्व को समझते हुए इसका संरक्षण और संवर्धन करे। अनुच्छेद-49 में निरूपित निदेशक तत्त्व भी स्मारकों तथा राष्ट्रीय कलात्मक एवं ऐतिहासिक महत्त्व के स्थानों और वस्तुओं को सुरक्षित रखने का निर्देश देते हैं।

प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा एवं उसका संरक्षण

भारतीय संविधान के अनुसार, पर्यावरण की रक्षा करना भी नागरिकों का कर्तव्य है; क्योंकि किसी देश का पर्यावरण (जिसमें वन, नदी, झील, वन्य जीव-जंतु आदि आते हैं) देश की आर्थिक वृद्धि में सहायक होता है। इसके अंतर्गत यह भी शामिल है कि प्रत्येक नागरिक में जीव मात्र के प्रति दया की भावना होनी चाहिए। वैसे भी भारतीय संस्कृति में ‘जिओ और जीने दो’ का आदर्श मान्य रहा है। _अनुच्छेद-48 (क) के अंतर्गत भी पर्यावरण संरक्षण, सुधार तथा वनों और वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए निर्देश दिए गए हैं। मूल कर्तव्य संबंधी वर्मा समिति ने उच्चतम न्यायालय के ऐसे 138 निर्णयों की सूची दी है, जिनमें पर्यावरण संरक्षण पर विचार हुआ।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास

संविधान के अनुसार, नागरिकों का यह कर्तव्य है कि वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करें। किसी भी व्यक्ति को हिंदू, मुसलिम, सिख या ईसाई अथवा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र अथवा धनी या निर्धन आदि रूपों में न देखकर केवल मनुष्य के रूप में देखें। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ-साथ यह मानववादी भी होना आवश्यक है। प्रत्येक नागरिक को निरंतर अपना ज्ञान बढ़ाते रहना चाहिए। साथ ही उसमें सुधारवादी दृष्टिकोण का भी विकास करते रहना चाहिए।

सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा

सार्वजनिक संपत्तियों की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। इसके लिए उन्हें कोई ऐसा काम नहीं करना चाहिए, जिससे सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुँचे। सार्वजनिक संपत्ति जनता की संपत्ति होती है, उसे क्षति पहुँचाने का मतलब है, अपनी संपत्ति की क्षति करना और उसकी रक्षा न करना।

इस प्रकार सार्वजनिक संपत्ति पर अप्रत्यक्षतः समस्त नागरिकों का हक है। नागरिकों को भी हिंसा से दूर रहना चाहिए। यह भी इसी कर्तव्य के अंतर्गत उपबंधित है। इसका अभिप्राय है कि नागरिकों को व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक अथवा राजनीतिक किसी भी प्रकार की समस्या के लिए कभी हिंसात्मक रूप नहीं अपनाना चाहिए।

व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों का उत्कर्ष करना

भारतीय नागरिकों को व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में विकास के लिए सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिए, ताकि राष्ट्र निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर रहते हुए उपलब्धियों की नई ऊँचाइयों को छू सके। इससे नागरिक तथा राष्ट्र-दोनों का उत्थान होगा।

मूल कर्तव्यों का अनुपालन

निम्नलिखित मामलों में मूल कर्तव्यों के प्रवर्तन के लिए वैधानिक प्रावधानों की व्यवस्था है

  • राष्ट्रीय ध्वज, भारतीय संविधान और राष्ट्रगीत की कोई अवमानना न की जाए। राष्ट्रीय सम्मान की अवमानना पर रोक संबंधी विधेयक सन् 1971 में पारित किया गया था।
  • राष्ट्रीय प्रतीक और नाम के अनुचित उपयोग पर रोक संबंधी विधेयक सन् 1950 में पारित कर दिया गया था। इसके उद्देश्यों में राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगीत का अनुचित उपयोग रोकना भी शामिल है।
  • राष्ट्रीय ध्वज के प्रदर्शन में सही ढंग से बरताव किया जाए, यह सुनिश्चित करने के लिए समय-समय पर दिए गए निर्देश ‘भारतीय ध्वज संहिता’ में संकलित हैं।
  • वर्तमान आपराधिक कानूनों के अंतर्गत यह सुनिश्चित करनेवाले कई प्रावधान विद्यमान हैं कि जिन गतिविधियों से विभिन्न जनसमूहों के बीच धर्म, नस्ल, जन्म-स्थान, निवास, भाषा आदि आधारों पर शत्रुता को प्रोत्साहन मिलता हो, उन्हें उचित सजा के दायरे में लाया जा सके। ऐसा लेखन, भाषण, हाव-भाव, गतिविधियाँ, अभ्यास, अंग-संचालन आदि जिससे अन्य समुदायों के बीच असुरक्षा अथवा दुर्भावना पैदा होती हो, भारतीय दंड संहिता (आई.पी.सी.) की धारा-153(क) के अंतर्गत वर्जित है।
  • राष्ट्रीय एकता के प्रति दुराग्रहपूर्ण आरोप और दावे आई.पी.सी. की धारा- 153(ख) के तहत दंडनीय हैं।
  • गैर-कानूनी गतिविधि (निवारक) अधिनियम, 1967 के तहत किसी सांप्रदायिक संगठन को एक गैर-कानूनी संगठन घोषित किया जा सकता है।
  • धर्म से जुड़ी आक्रामक गतिविधियाँ आई.पी.सी. की धाराओं-295-298 (अध्याय 15) के अंतर्गत आती हैं।
  • नागरिक अधिकार अधिनियम, 1955 (पहले अस्पृश्यता निवारक अधिनियम, 1955) के संरक्षण का प्रावधान।

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा-123(3) और (3-क) यह घोषित करती हैं कि धर्म के आधार पर और भारतीय नागरिकों के विविध वर्गों के बीच धर्म, जाति, समुदाय अथवा भाषा को आधार बनाते हुए शत्रुता और घृणा की भावना फैलाकर वोट माँगना एक भ्रष्ट व्यवहार है। भ्रष्ट व्यवहार में संलग्न कोई भी व्यक्ति जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा-8(क) के तहत संसद् अथवा किसी राज्य विधानसभा की सदस्यता के अयोग्य ठहराया जा सकता है।

नवीन ध्वज संहिता

  • कोई भी व्यक्ति केवल सूर्योदय से सूर्यास्त तक ही झंडा फहरा सकता है।
  • झंडे की चौढ़ाई व लंबाई का अनुपात 2 : 3 होना चाहिए।
  • इसे वस्त्र, गद्दे या नैपकिन पर प्रिंट नहीं करना चाहिए।
  • अंत्येष्टि के कफन के रूप में इसका प्रयोग न करें।
  • वाहनों पर झंडा न लपेटें।
  • इसका ऊपरी भाग नीचे (अर्थात् उल्टा) करके न फहराएं।
  • इसे जमीन से स्पर्श नहीं करना चाहिए।
  • संयुक्त राष्ट्र व अन्य देशों के झंडों को छोड़कर इसे सभी झंडों से ऊंचा फहराना चाहिए।
  • क्षतिग्रस्त झंडे को न फहराएं।
  • संशोधित संहिता 26 जनवरी, 2003 से लागू की गई। झंडा विवाद तथा नवीन ध्वज संहिता
  • पुरानी ध्वज संहिता, जिसमें प्राचीन कालीन प्रावधानों की एक लंबी सूची थी, मं झंडा फहराने का अधिकार कुछ ही व्यक्तियों का विशेषाधिकार था।
  • वर्ष 2002 में जिंदल समूह के उपाध्यक्ष नवीन जिंदल ने झंडा फहराने के अपने अधिकार पर प्रतिबंध को चुनौती देते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की।
  • दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश कि ‘तिरंगा फहराना मौलिक अधिकार है’ तथा इसके बाद ध्वज संहिता के उदारीकरण के प्रश्न के परीक्षण हेतु समिति गठित करने के सर्वोच्च न्यायालय की अनुशंसा के पश्चात् सरकार ने समिति गठित की। समिति की अनुशंसा के आधार पर केंद्रीय मंत्रिमंडल ने तिरंगा फहराने से संबंधित अनावश्यक कठोर नियमों में छूट देने का निर्णय लिया है।

नागरिकों से संविधान की अपेक्षा

भारतीय संविधान नागरिकों से अपेक्षा करता है कि वे अपने दायित्वों का निर्वाह पूरी निष्ठा एवं लगन के साथ करेंगे। सभी नागरिकों को न केवल कर्तव्यों का ज्ञान होना चाहिए, अपितु उनके पालन के प्रति भी पूर्णतः सचेत रहना चाहिए। एक अच्छा नागरिक विधि का सम्मान करता है। जागरूक नागरिकता की माँग है कि जनहित को व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर रखा जाए। वस्तुतः नागरिकों के मूल कर्तव्य मूलभूत आदेश हैं। हर नागरिक नैतिक दृष्टि से इन कर्तव्यों से बँधा है। इसलिए संविधान की यह भी अपेक्षा है कि नागरिक संविधान के सभी अनुच्छेदों के शब्दों और भावनाओं का पालन करें।

11 मौलिक कर्तव्य संविधान में कब शामिल किया गया?

11 मौलिक कर्तव्य 86 वें संविधान संशोधन द्वारा 2002 में जोड़ा गया। अनुच्छेद 51 A तहत 11 मौलिक कर्तव्य भारतीय संविधान में जोड़ा गया। 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा संविधान के अनुच्छेद 51ए में संशोधन करके (भ) के बाद नया अनुच्छेद (ट) जोड़ा गया है, “जिसमें 14 साल तक आयु के बच्चे के माता-पिता को अपने बच्चे को शिक्षा दिलाने के लिए अवसर उपलब्ध कराने का प्रावधान है।

  • मूल कर्तव्यों का समावेश डॉ. स्वर्ण सिंह समिति (1974) की सिफारिशों के आधार पर किया गया था।
  • भारतीय संविधान में नागरिकों के लिए मूल कर्तव्यों की प्रेरणा पूर्व सोवियत संघ के संविधान से मिली थी।
  • मूल कर्तव्य के पालन न किए जाने पर दंड की कोई व्यवस्था न होने पर मूल कर्तव्यों को न्यायालय में वाद योग्य नहीं बनाया जा सकता है।
  • मूल कर्तव्यों को भंग करने के लिए यद्यपि संविधान में कोई व्यवस्था नहीं की गई है लेकिन संसद् को यह शक्ति प्राप्त है कि वह कानून बनाकर मूल कर्तव्यों के उल्लंघन की दशा में दोषी व्यक्तियों के लिए दंड की व्यवस्था करें।
  • मूल कर्तव्य सभी कम्युनिस्ट देशों विशेषकर चीन, रूस के संविधान में मिलते हैं।
  • भारत के अतिरिक्त दूसरा प्रजातांत्रिक देश जापान है जहां पर मूल कर्तव्यों को संविधान में उल्लेखित किया गया है।

कर्तव्यों के इस महत्त्व को देखते हुए ही संभवतः स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों के आधार पर सन् 1976 में संविधान के 42वें संशोधन के दौरान, संविधान के चतुर्थ भाग के बाद चतुर्थ (क) जोड़ा गया, जिसमें मूल कर्तव्यों की व्यवस्था की गई, लेकिन विडंबना यह है कि मूल कर्तव्यों की कोई अधिशास्ति नहीं है। उनका पालन करने या न करने का दबाव कोई नहीं डाल सकता। इन कर्तव्यों का उल्लंघन करने पर दंड देने के लिए कोई उपबंध नहीं है।

वस्तुतः संविधान में मूल कर्तव्यों का समावेश करने का उद्देश्य नागरिकों को उनके सामाजिक एवं आर्थिक दायित्वों के प्रति सचेत करना था। इसके साथ ही नागरिकों को अपने हित में कुछ करने, न करने की चेतावनी देना भी था।

42वें संविधान संशोधन अधिनियम में संसद् को यह शक्ति प्रदान की गई है कि वह विधि बनाकर मूल कर्तव्यों के उल्लंघन की दशा में दोषी व्यक्तियों के लिए दंड की व्यवस्था कर सकती है। 86वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा अनुच्छेद-51 में संशोधन करके खंड (क) के बाद जोड़े गए नए खंड के अनुसार, आरंभिक शिक्षा को सर्वव्यापी बनाने के उद्देश्य से अभिभावकों के लिए भी यह कर्तव्य निर्धारित किया गया कि वे 6 से 14 वर्ष तक के अपने बच्चों को शिक्षा का अवसर प्रदान करें।

एसएससी सीजीएल 2022 का सिलेबस क्या है

 

  1. मूल कर्तव्य कहाँ से लिया गया है?

    भारतीय संविधान में मौलिक कर्तव्य को रूस के संविधान से लिया गया। सरदार स्वर्ण सिंह समिति की अनुशंसा पर भारतीय संविधान के 42 वें संविधान संशोधन द्वारा मौलिक कर्तव्य को संविधान में जोड़ा गया।

  2. मौलिक कर्तव्य किस देश से लिया गया?

    भारतीय संविधान में मौलिक कर्तव्य रूस देश से लिए गए है.

  3. 11 वा मौलिक कर्तव्य संविधान में कब शामिल किया?

    भारतीय संविधान में 11 मौलिक कर्तव्य 86 संविधान संशोधन 2002 के द्वारा छोड़ा गया था। प्रारंभ में 10 मौलिक कर्तव्य थे।

  4. मूल कर्तव्य की संख्या कितनी है?

    प्रारंभ में मूल कर्तव्य की संख्या 10 थी परंतु 86 संविधान संशोधन द्वारा 2002 में मूल कर्तव्य को बढ़ाकर 11 कर दिया गया